अतीत के साये से भागते फिरे हम,
उन्होंने धित्कार, उन्होंने रुलाया,
उन्होंने मारा मेरे दिल का हर अरमान,
बनाया हस्ते को बेजान, हस्ते को बेजान.
होंसले बुलंद थे, रास्ते नए थे,
करनी थी एक शुरवात, सोचा था वो होंगे साथ,
और देंगे हमारा साथ, खिंच कर ले गए अँधोरे मैं,
जहा बस डर था हमारे साथ,
डर से डरे हम डर मैं जिए हम,
आखिर कब तक,अतीत के साये से भागते फिरे हम
अब तो डर भी खत्म हुआ , ऐसे खुद से लढ़े हम,
ज़िन्दगी जीना का तरीका, नए से सीखे हैं हम,
लगाओ बाज़ी छल, कपट, की अब ना बिखरेंगे हम,
साम, दाम, दंड, भेद, को पीछे छोड़ चले हम,
डर से डरे हम डर मैं जिए हम,
आखिर कब तक,अतीत के साये से भागते फिरे हम
अतीत क साये से भागते फिरे हम, भागते फिरे हम .
Written by-
©Ashwini Chaudhary.
बहुत ख़ूब
ReplyDeleteकहते है....
डर के आगे जित है।
फ़िर डर को ही ताकद बना लो....
जी हुज़ूर सही कहा है आपने
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